भारत में वकीलों के लिए ज़रूरी बातें
बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया के नियमों का Rule 36 एडवोकेट को सीधे या घुमा-फिराकर काम मांगने या प्रचार करने से रोकता है। संशोधन के बाद अब वकील वेबसाइट पर सीमित जानकारी दे सकते हैं: नाम, पता, फ़ोन, ईमेल, एनरोलमेंट नंबर और तारीख़, पहली बार एनरोल करने वाली स्टेट बार काउंसिल और मौजूदा रोल, प्रोफ़ेशनल व शैक्षिक योग्यता, और प्रैक्टिस एरिया। इसी लिस्ट तक रहें; टेस्टिमोनियल, केस के नतीजे, फ़ीस की तुलना या क्लाइंट के साथ फ़ोटो न डालें। कई वकील एक डिस्क्लेमर पेज भी रखते हैं। भारत में ज़्यादातर क्लाइंट रिश्तेदारों, CA या दूसरे वकीलों के रेफ़रल से आते हैं और फिर नाम ऑनलाइन जांचते हैं। आप किन भाषाओं में बहस और सलाह देते हैं, यह भी लिखें, क्योंकि ज़िला अदालतों में काम अक्सर स्थानीय भाषा में होता है।
आम गलतियाँ जिनसे बचें
- जीते हुए केस, क्लाइंट के नाम या “शानदार ट्रैक रिकॉर्ड” जैसे दावे लिखना। यह Rule 36 में दी गई तथ्यात्मक जानकारी से आगे है, इसलिए प्रैक्टिस एरिया सीधे शब्दों में लिखें।
- क्लाइंट के टेस्टिमोनियल या स्टार रेटिंग लगाना। असली तारीफ़ को भी काम मांगना माना जा सकता है, इसलिए रिव्यू वेबसाइट से दूर रखें और रेफ़रल को ऑफ़लाइन होने दें।
- एनरोलमेंट नंबर और स्टेट बार काउंसिल का नाम न लिखना। दोनों को ठीक वैसे ही लिखें जैसे एनरोलमेंट सर्टिफ़िकेट पर हैं, ताकि कोई भी आपकी स्थिति जांच सके।
- कॉन्टैक्ट फ़ॉर्म में केस की पूरी जानकारी मांगना। सिर्फ़ नाम, संपर्क और मामले का सामान्य प्रकार पूछें, और लिखें कि फ़ॉर्म भरने से वकील-क्लाइंट संबंध नहीं बनता।